क्या लालू यादव अपने राजनीतिक करियर के सबसे बुरे दोर में प्रवेश कर चुके है?

लालू यादव के लिए चित्र परिणाम

*TNA REPORTER GHAZIABAD:लालू यादव के राजनीतिक करियर में उतार-चढ़ाव आना कोई नई और बड़ी बात नहीं है लेकिन इस बार हालात दूसरे हैं

नीतीश कुमार का इस्तीफा देना था कि बिहार में चल रहा महागठबंधन का प्रयोग भी महज 20 महीने में ही असफल हो गया. इसके साथ ही अब राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव बिहार की सत्ता से भी दूर हो गए हैं. तीन साल पहले जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब वे केंद्र की सत्ता से बाहर हो गए थे. पिछले तीन दशक में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब लालू यादव न तो केंद्र में सत्ता में हैं, और न राज्य में. नीतीश के ताजा दांव के बाद कई आलोचकों का मानना है कि वे अपने राजनीतिक करियर के सबसे बुरे दौर में पहुंच गए हैं.

वैसे लालू यादव के राजनीतिक करियर में उतार-चढ़ाव आना कोई नई और बड़ी बात नहीं है. उनके सामने सबसे पहली मुश्किल अब से ठीक 20 साल पहले 1997 में आई थी. वह भी जुलाई का आखिरी हफ्ता ही था, जब चारा घोटाले से जुड़े मामले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद सीबीआई अदालत में सरें​डर करना पड़ा था. लेकिन लालू ने इससे पहले अपनी पत्नी राबड़ी देवी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर इस चुनौती से पार पा लिया था. 1998 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार बनी उस वक्त भी बिहार में राबड़ी देवी की सत्ता जारी थी. राबड़ी 2005 में मुख्यमंत्री के पद से हटतीं उससे पहले 2004 में ही लालू रेलमंत्री के रूप में केंद्र की सत्ता में वापसी कर चुके थे. यानी कि लालू यादव की पार्टी राज्य की सत्ता से तो विदा हो गई, लेकिन लालू केंद्र की सत्ता में हिस्सेदार बने हुए थे.

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में लालू हालांकि मंत्री नहीं थे, लेकिन कम से कम उनकी पार्टी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा तो थी ही. 2014 में नरेंद्र मोदी की आंधी में लालू यादव और नीतीश कुमार ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, और उसमें दोनों को हार मिली. अब केंद्र से यूपीए बाहर हो गया था और लालू की पार्टी भी. बदली हुई परिस्थितियों में नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवा दिया. मांझी से परेशान नीतीश कुमार को जल्दी ही अहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी की आंधी को अकेले रोकना संभव नहीं. ऐसे में उन्होंने लालू के साथ गलबहियां करने में देर नहीं लगाई. इस तरह ​लालू फिर राज्य में सत्ता के साथ आ गए.

लेकिन इस बार हालात दूसरे हैं. नरेंद्र मोदी पूरे दमखम के साथ पूरे देश में अपना प्रभाव बढ़ाते चले जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश की जीत और विपक्षी दलों का मौजूदा हाल देखने के बाद माना जा रहा है कि 2019 में भी उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोका नहीं जा सकता. वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के साथ वाले एनडीए को बिहार में हराना लालू के लिए टेढ़ी खीर ही होगा. यदि नीतीश बाद में भाजपा से दूर भी हुए तो लगता नहीं कि अब दोनों के बीच फिर से विश्वास का वह गठजोड़ बन पाएगा. ऐसे में कइयों का मानना है कि लालू का अगले कई सालों तक सत्ता से दूर रहना तय है.

लेकिन लालू की चुनौती यहीं खत्म नहीं होती. उन पर भ्रष्टाचार के कई मुकदमे भी चल रहे हैं. इनके चलते उन्हें पटना से रांची की दौड़ लगाते रहनी पड़ती है. अब उनकी उम्र भी 68 साल हो चली है. इसके अलावा उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव और बेटी मीसा भारती पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं. हो सकता है दोनों को लंबे मुकदमे और सजा का सामना भी करना पड़े. हालांकि राजनीति में कब क्या हो कहना मुश्किल है? फिर भी मौजूदा हालात तो यही बताते हैं कि उनकी आगे की डगर काफी मुश्किल है.

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